मैं न तो महान् ज्योतिषाचार्य हूँ न महान् वास्तुशास्त्री हूँ । इस स्वनिर्मित `महान´ शब्द से तो मैं सदैव कौसों दूर रहना चाहता हूँ । मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि संगीत संसार का जिंदा जादू था, है और रहेगा। सरगम के सांचों में ढला हुआ शब्द चरमोत्कर्ष पाकर शब्द-ब्रह्म बन जाता है। संगीत की सिद्ध स्वर-लहरियाँ गायक को ही नहीं, श्रोताओं को भी अमर करने की सामथ्र्य रखती हैं, यथा-श्रीकृष्ण व गोपियाँ। कवि अमृत "वाणी" |
|